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विद्यालय के संस्थापक का जीवन-परिचय


भारतीय साहित्याकाश के जाज्वल्य नक्षत्र, सरस्वती के वरदपुत्र, महान युगचेता, युग प्रवर्तक, समाजसेवी, राष्ट्रप्रेमी, हिन्दी भाषा एवं साहित्य के उन्नायक, विराट व्यक्तित्व एवं बहुआयामी प्रतिभा की छटा बिखेरने वाले भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र का जन्म काशी के सभ्रान्त, सामन्ती वातावरण वाले वैश्य परिवार में सन् 1850 ई0 में गोपाल चन्द्र ‘गिरधर दास‘ के घर में, भारतीय स्वाधीनता संग्राम एवं 1857 की स्वतः स्फूर्त क्रान्ति के ठीक 7 वर्ष पूर्व वाराणसी में उस समय हुआ था जिस समय भारतीय समाज, आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक धरातल पर तमाम तरह के संक्रमणों एवं झंझावातों से गुजर रहा था। लार्ड मैकाले की भारतीयों को अंग्रेज परस्त एवं अंग्रेज दाँ बनाने की शिक्षा नीति देशवासियों पर जबरन थोपी जा रही थी एवं हिन्दी भाषा तथा भारतीय भाषाओं की घोर उपेक्षा की जा रही थी। ऐसे में भारतेन्दु के जन्म से एवं उनके उद्घोष ‘निज भाषा उन्नति अहे, सब उन्नति को मूल‘ से भारतीय साहित्य, समाज एवं संस्कृति को एक नई चेतना, नई स्फूर्ति एवं नई दिशा मिली और सच्चे अर्थों में अपने उपनाम को सार्थक करते हुए ‘भारतेन्दु‘ ने निबिड़ अज्ञान रूपी अन्धकार से दुर्दशाग्रस्त भारत को अपने ज्ञानरूपी दिव्य प्रकाश से अवलोकित करने का भगीरथ प्रयास किया। अपने शैशवकाल में ही "Coming events cast their shadows before" ‘होनहार विरवान के होत चिकने पात‘ की उक्ति को शब्दशः चरितार्थ करते हुए अपनी नैसर्गिक प्रतिभा, काव्यात्मक क्षमता का दिग्दर्शन कराते हुए पाँच वर्ष की अल्पायु में अपनी प्रथम कविता ‘लै व्यौड़ा ठाडे भये श्री अनिरूद्ध सुजान, बाणासुर की सेन को हनन लगे भगवान‘ के द्वारा न केवल अपने पिता एवं परिवार का वरन् भारतवर्ष की सांस्कृतिक राजधानी बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी को अपनी विलक्षण प्रतिभा से आश्चर्यचकित कर दिया और यह संकेत दिया कि आने वाले समय में वे अपनी विशिष्ट छाप छोड़ेंगे। उसे ही आज हम हिन्दी साहित्य ‘भारतेन्दु युग‘ के नाम से उनकी अविस्मरणीय हिन्दी साहित्य सेवा और चिरस्मरणीय योगदान को भाव विह्वल होकर याद करते हैं। भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने स्थानीय क्वीन्स काॅलेज, वाराणसी में प्रवेश लिया था पर माता-पिता का बचपन में ही स्वर्गवास हो जाने के कारण उन्होंने विद्यालय छोड़ दिया और उनकी शिक्षा-दीक्षा घर ही पर स्वाध्याय एवं गुरूजनों की देखरेख में पूरी हुई। भारतेन्दु बाबू विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न बालक थे, इसलिए भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत, फारसी, बंगला, मराठी आदि विभिन्न भाषाओं के पण्डित थे। तमिल एवं तेलगू जैसी भाषाओं को छोड़कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं पर उनका अधिकार था। उनके जीवन का अधिकांश समय लिखने-पढ़ने में व्यतीत होता था। शायद ही कोई ऐसा समय रहा हो जब उनके पास लेखनी, कागज-दवात न रहा करता हो। उनकी बहुआयामी प्रतिभा एवं श्रेष्ठ व्यक्तित्व का अनुमान लगाना मात्र इस बात से ही सम्भव हो जाता है कि मात्र 16 वर्ष के किशोरवय में उन्होंने ‘‘कविवचन सुधा‘‘ जैसे पत्र का सम्पादन किया जो आजीवन उनकी असामयिक मृत्यु तक चलता रहा। तदन्तर उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिका और पुस्तकों का लेखन कार्य किया जो हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हंै। गद्य-पद्य, निबंध, आलोचना, नाटक, कथा-साहित्य, इतिहास, पत्र-पत्रिकायें हिन्दी साहित्य की लगभग हर विधा पर भारतेन्दु बाबू ने समान रूप में अपनी लेखनी चलायी, साथ ही साथ धर्म, पुराण, भाषा, संगीत जैसे जटिल विषयों पर भी भारतेन्दु बाबू ने साधिकार लेखनी चलायी। भारतेन्दु बाबू ने हिन्दी खड़ी बोली को परिष्कृत एवं परिमार्जित स्वरूप प्रदान किया पर साथ ही उनकी भाषा में अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी के शब्दों का भी प्रयोग आवश्यकतानुसार हुआ। उनकी भाषा की सबसे बड़ी विशेषता व्यवहारिकता, प्रवाहमयता एवं जीवंतता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में वर्णनात्मक, विचारात्मक, भावात्मक, व्यंग्यात्मक, विवेचनात्मक जैसी साहित्य की प्रचलित शैलियों का प्रयोग किया। भारतेन्दु बाबू मात्र 20 वर्ष की अल्पवय में आनरेरी मजिस्ट्रेट और तदुपरान्त लाँग्यूनिसिपल कमिश्नर के रूप में भी रहे। मात्र 16 वर्ष की अल्पवय में उन्होंने ”चैखम्भा स्कूल” की स्थापना जनसामान्य में विद्या एवं ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए किया जो पनपते-बढ़ते हुए हरिश्चन्द्र विद्यालय (सम्बद्ध प्राइमरी, इण्टर बालक एवं बालिका, स्नातकोŸार महाविद्यालय) के रूप में अपनी अनेक शाखाओं, प्रशाखाओं के साथ एक विशाल वटवृक्ष का रूप धारण कर चुका है। हिन्दी की उन्नति एवं लोगों में सामाजिक, सांस्कृतिक चेतना पैदा करने हेतु भारतेन्दु बाबू ने हिन्दी डिबेटिंग क्लब, अनाथ रक्षिणी तदीय समाज, काव्य समाज इत्यादि संस्थाओं के संस्थापक एवं उनके सभापति रहे। यही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर कई सभाओं एवं संगठनों के अध्यक्ष-मंत्री पद को इन्होंने सुशोभित किया है। राजसी रईसी, धन-वैभव और सम्पन्नता इन्हें पारिवारिक विरासत में प्राप्त थी। पर पूर्वजों के इस संचित धन का मुक्त-हस्त उपभोग एवं दान करने की प्रवृति के चलते वह अपार धन जो सेठ अभियचन्द्र जैसे सेठ से इन्हें उŸाराधिकार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होते हुए प्राप्त हुआ था, इनके अंतिम समय तक समाप्त प्राय हो चुका था। भारत की प्राचीन परम्परा के अनुसार इनका अकूत धन-वैभव ‘मदाय‘ अर्थात् घमण्ड के लिए नहीं अपितु ‘दानाय‘ मुक्त हस्त से लुटाने के लिए था। इनकी मान्यता थी कि जिस धन ने मेरे पूर्वजों को खाया है, मैं उसे ही खा डालूँगा अर्थात् समाप्त कर दूँगा। इस परिवार की रईसी का उदाहरण मात्र इन दो एक घटनाओं से स्पष्टतः परिलक्षित होता है कि उनके विवाह में कुँए में चीनी घोलकर बारात का स्वागत किया गया था। यही नहीं एक बार जब एक गन्धी (इत्र विक्रेता) काशी में अपने बहुमूल्य इत्र को नहीं बेच पाया तो उसकी काशी नगरी को चुनौती देने की बात सुनकर इन्होंने उसके इत्र को गुसलखाने में रखवाकर उससे तुरंत स्नान कर उसे इत्र के मूल्य के रूप में हुण्डी प्रदान करा दिया और धन-सम्पति तथा वैभव के प्रति अपनी वितृष्णा दिखायी। बेशकीमती वस्तुओं को एकत्र करने का इन्हें शौक था, जिनमें से आज भी कुछ वस्तुएँ इनके ”भारतेन्दु भवन” स्थित, पैतृक मकान में उपलब्ध हंै। जो इनकी कला पारखी नजरों की अन्यतम उदाहरण हंै। भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र परोपकार एवं उदारता के सच्चे अर्थों में प्रतिमूर्ति थे। बहुत से लेखकों, विद्वानों, सभा-संस्थाओं, गरीबों एवं दीन-दुखियों की सहायता इनके द्वारा की जाती थी। पं0 परमानन्द जी की ‘सतसई संस्कृत टीका‘ पर जहाँ इन्होंने रू0 पाँच सौ की धनराशि दी वहीं विभिन्न विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए इनके द्वारा पुरस्कृत भी किया जाता था। मद्रास, मुम्बई एवं बंगाल की स्त्रियों को परीक्षा उŸाीर्ण करने पर प्रोत्साहन स्वरूप इनके द्वारा बनारसी साड़ियाँ उपहार एवं प्रोत्साहन स्वरूप भेजी जाती थीं। इन्होंने नेशनल फण्ड, होमियोपैथिक डिस्पेन्सरी गुजरात व जौनपुर रिलीफ फण्ड, सेलजे होम, प्रिंस आॅफ बेल्स हाॅस्पिटल और विभिन्न पुस्तकालयों की समय-समय पर प्रभूत मात्रा में धन प्रदान कर सहायता की एवं लोकोपकार का कार्य किया। यद्यपि भारतेन्दु बाबू का परिवार हमेशा से तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति निष्ठावान रहा था और तद्नुरूप भारतेन्दु ने भी निष्ठावान बने रहने का भरपूर प्रयास किया पर समय-समय पर देश-प्रेम की भावना इनके परिवार की राजनिष्ठा पर भारी पड़ जाती थी और इनका उद्गार ”अंगे्रज राज सुखसाज सबै विधि भारी, पै धन विदेश चलिजात यहै हैख्वारी” जैसे वाक्यों से फूट पड़ता था। अंग्रेज शासकों के बारे में इनका विचार ‘‘भीतर-भीतर सब रस चूसै, बाहर से तन-मन-धन मूसै” था। अंग्रेजी भाषा की तीखी आलोचना करते हुए भारतेन्दु बाबू ने इस पर करारा प्रहार किया। ‘‘सब गुरूजन को बुरो बतावै, खिचड़ी अलग पकावै। भीतर तत्व न झूठी तेजी, क्यों सखि साजन नहिं अंग्रेजी।।‘‘ भारतवर्ष की महिमा का वर्णन करते हुए भारतेन्दु बाबू अंग्रेजों के शासनकाल में इसकी दुर्दशा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि- ‘‘जो भारत जग में रह्यो सबसे उत्तम देश, ताही भारत में रह्यो अबनाहि सुख के लेस।‘‘ वस्तुतः इनका मन भारतीयता की भावना से ओतप्रोत था। गोवध समाप्त करने के लिए इन्होंने 60,000 हस्ताक्षर कराकर दिल्ली दरबार के समय लार्ड लिटिन को भेजा था। भारतेन्दु बाबू की प्रतिभा से प्रभावित होकर सन् 1880 ई0 में सार सुधा निधि ने इन्हें ‘‘भारतेन्दु‘‘ की पदवी से विभूषित करने के प्रस्ताव पर भारतवर्ष के सभी पत्रों, सम्पादकों एवं गुणग्राही विद्वानों ने ‘‘भारतेन्दु‘‘ की पदवी प्रदान कर सच्चे अर्थों में इसकी विलक्षण योग्यता का सम्मान किया। पर ऐसी महान् प्रतिभायें हमारे बीच बहुत दिनांे तक परमपिता परमेश्वर के द्वारा भी नहीं छोड़ी जाती, क्योंकि इनकी आवश्यकता तो ऊपर वाले को भी हुआ करती है। जैसा कि अंग्रेजी में एक कहावत है "Whom God love they die young" के अनुरूप भारतेन्दु बाबू का देहावसान भी 35 वर्ष की अल्पायु में सन् 1885 ई0 में हो गया और भारतेन्दु बाबू ने जो भविष्यवाणी अपने बारे में की थी। ​ ‘‘कहैंगे सबही नैन नीर भरि-भरि पाछें, प्यारे हरिश्चन्द्र की कहानी रह जायेगी‘‘ वह पूर्णतः चरितार्थ हो गयी। उनके द्वारा किये गये अनेक अनूठे कार्य हमारे देश एवं देशवासियों को दिशा देते रहेंगे।

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